साण्डेराव का इतिहास हजारों साल पुराना है

रतनचंद पुनमिया जैन सांडेराव निवासी-मुंबई प्रवासी
जीवन को लगातार संघर्षो के नाम लिख देने वाले ८२ वर्ष के रतनचंद कुंदनमलजी पुनमिया (सांडेराव) कर्म साधना संकल्पनिष्ठा एवं सत्यता स्पष्टवादिता के रंगों में रचे बसे कर्मयोगी हैं, आप जीवन और अध्यात्म के प्रति सुसंस्कारों के अनुयायियों में गिने जाने वाले एक सशक्त हस्ताक्षर है, जानते हैं ऐसे विरार व्यक्तित्व के बारे में...

रतनचंद जी पुनमिया अपनी लगन व मेहनत के बल पर अपने पिता द्वारा स्थापित आभूषणों के कारोबार का विस्तार किया। ‘कुंदन ज्वेलर्स’ मुंबई में जाना माना नाम है, जिसकी कई शाखाएं है। मुंबई प्रवासी होते हुए भी अपनी जन्मभूमि सांडेराव के विकास में हमेशा सहयोग प्रदान किया है, रतन चंद जी पुनमिया से साक्षात्कार लिया समस्त राजस्थानी समाज की विश्वस्तरीय पत्रिका ‘मेरा राजस्थान’ के प्रतिनिधि द्वय ने उनके अंधेरी स्थित निवास स्थल पर…

आप अपने बारे में बताइये?
मेरा जन्म स्थान सांडेराव है, मेरी प्राथमिक शिक्षा वहीं सम्पन्न हुई, आज से ७० वर्ष पूर्व मेरा मुंबई आना हुआ, यहां मेरे पिताजी की आभूषणों की दुकान थी, मैट्रिक तक की शिक्षा ग्रांट रोड स्थित मारवाड़ी विद्यालय से ग्रहण की, १२ वर्ष की आयु में ही पिता का साया सर से उठ गया, जिससे घर की सारी जिम्मेदारी मुझ पर आ पड़ी, हम एक भाई और एक बहन हैं, बहन मुझसे ४ वर्ष बड़ी है पिता के साझी व्यवसाय में कुछ वर्ष तक व्यवसाय करने के पश्चात स्वयं के बलबूते पर कारोबार प्रारंभ किया। आज पिता के नाम पर स्थापित ‘कुंदन ज्वेलर्स’ एक प्रसिद्ध ज्वेलर्स की दुकान स्थापित है, परिवार में धर्मपत्नी व दो पत्र सुरेश व नितिन हैं, बड़े पुत्र सुरेश का कुछ वर्ष पूर्व ही निधन हुआ है उनकी पत्नी व २ पुत्री व पुत्र तथा छोटे बेटे नितिन की पत्नी व पुत्र-पुत्री हैं, सभी संयुक्त परिवार के रूप में निवासित हैं।

आपके सामाजिक कार्य के बारे में बताएं:
व्यक्तिगत रूप से सामाजिक कार्यों में तो संलग्न हूँ, पर उम्र के इस पड़ाव में भाग दौड़ संभव नहीं हो पाता, लगभग सभी सामाजिक कार्यों से अपने आप को सीमित कर लिया है, सांडेराव स्थित शांतिनाथ जिनालय ट्रस्ट में संस्थापक सदस्य, ट्रस्टी रहा हूँ, अध्यक्ष व १५ वर्षों तक सचिव के पद पर सेवारत रहा, अंधेरी रिक्रीएशन क्लब में १४ वर्षों तक अध्यक्षपद पर रहकर सेवायें प्रदान की, अंधेरी व्यापारी संघ में अध्यक्ष, चंद्रप्रभु जैन मंदिर में ट्रस्टी, चंद्रमणी जैन संघ बालारोड बडोदरा में उपाध्यक्ष पद पर भी रहा, इसके साथ अन्य कई सामाजिक संस्थाओं से आज भी जुड़ा हुआ हूँ।
अपनी जन्म भूमि सांडेराव के बारे में बताएं?
सांडेराव की सबसे बड़ी विशेषता व आकर्षण शांतिनाथ जिनालय , जिसका इतिहास हजारों वर्ष पुराना है, समय-समय पर इसकी प्राण प्रतिष्ठा होती रही है, यह एक मात्र ऐसा मंदिर है जो जमीन से कुछ फुट नीचे है।
योगनिष्ठ यशोभद्र सूरीश्वर जी की चमत्कारी कहानियां आज भी लोगों से सुनने को मिलती है, उनकी ही कृपा से पाली में प्रसिद्ध नवलखा मंदिर का निर्माण हुआ है। मणिभद्र जी का मंदिर, निम्बेश्वर महादेव जी का मंदिर आदि ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है, यहां जैन समाज के साथ-साथ चौधरी, घांची, माली, ब्राम्हण, सिरवी, ठाकुर आदि समाज के लोग आपसी प्रेम भाव के साथ मिलजुल कर रहते हैं, यहां के लोगों की आय का साधन किराना, कपड़ों की दुकान, सट्टाबाजी आदि है, वर्तमान समय में यहां के लोग देश के विभिन्न स्थानों पर निवास कर रहे हैं व रोजगार व व्यवसाय से जुड़े हैं, सांडेराव हाथी दांत के चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध है, हाथी दांत से चुड़ियों की कटिंग सिरवी समाज द्वारा किया जाता था। सांडेराव में अन्य कई दर्शनिय स्थल हैं, पर्यटन की दृष्टि से उत्तम है, आज यहां सभी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध होती है।

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के संदर्भ में:
सम्पादक बिजय कुमार जैन द्वारा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए किया जा रहा प्रयास सराहनीय है, ‘हिंदी’ को राष्ट्रभाषा का सम्मान अवश्य ही मिलना चाहिए, ‘हिंदी’ सभी लोगों द्वारा बोली व अपनाई जाती है, यह सम्पर्क का उत्तम माध्यम है, इसके साथ ही हमें अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देनी चाहिए हमारी भाषा ही हमारी संस्कृति है, अत: इसे नहीं भूलना चाहिए।

-मेरा

सांडेराव में निम्बेश्वर महादेव

श्री निम्बेश्वर मन्दिर-सांडेराव क्षेत्र में पाँच किलोमीटर की दूरी पर सांडेरावफालना की मुख्य सड़क पर श्री निम्बेश्वर महादेवजी का सुविख्यात तीर्थधाम है, जनश्रुति के अनुसार यह तीर्थ पाण्डवों ने बनवाया था, इसका प्राचीन नाम हीरलिया बैजनाथ था।
मन्दिर के निर्माण की कहानी-श्री नीम्बेश्वर महादेव का मन्दिर पाण्डवकालीन माना जाता है, परन्तु इसका अनेक बार जीर्णोद्धार हुआ है। काल-परिवर्तन से यह लुप्त भी हुआ और दैवयोग से प्रकट भी हुआ।
इस तीर्थ का जो वर्तमान रूप है, वह इस घटना से सम्बन्धित है, रवारी निम्बोराम ब्राह्मण निम्बाशंकरजी की गाय चराता था, गाय एक स्थान पर जब जाती तब वह वहाँ रूक जाती और उसके स्तनों से सारा दूध नीतर जाता, कुछ दिन यह क्रम जारी रहा। निम्बाशंकरजी ने रबारी को पूछा कि गाय का दूध कौन चुराता है? रबारी ने कहा कि मेरी जानकारी में तो वहाँ कोई नहीं आता। निम्बाशंकरजी ने सांडेराव के ठाकुर साहब दलपतसिंहजी से इसकी शिकायत की। ठाकुर साहब ने पता लगवाने की कोशिश की, परन्तु पता नहीं लग सका क्योंकि गाय मौका पाकर चुपके से चरती-चरती उस टीले पर पहुँच जाती और वहाँ पहुँचते ही पल भर में दूध बह जाता, अन्त में ठाकुर साहब ने अपने गुरूजी संत नीमनाथ जी से सारी घटना बताई, श्री नीमनाथजी ने अपने दिव्य ज्ञान से बताया कि गाय एक टीले पर जाती है और वहाँ जाते ही जब वह रूकती है तब पल भर में उसका दूध बह जाता है, उस टीले के नीचे महादेवजी का मन्दिर है। सावधानी से खुदाई करो, मन्दिर प्रकट होगा, फलस्वरूप उस स्थान की खुदाई की गई, वहाँ युगल नाथ (श्री शंकर और पार्वती की युगल मूर्ति) प्रकट हुई। सम्मुख सुन्दर नन्दी तथा बायीं ओर गजाननजी एवं दाहिनी ओर कार्तिकेयजी प्रकट हुए, वह स्थान एकान्त होने के कारण ठाकुर साहब दलपतसिंहजी की इच्छा हुई कि यह युगलनाथ-प्रतिमा की सांडेराव में सुन्दर मन्दिर निर्मित करवा कर प्रतिष्ठित की जाये, उन्होंने युगलनाथ को वहाँ से सांडेराव ले जाने के लिए ज्योंही उठाना चहा, तो मूर्ति इतनी भारी हो गई कि उठाना असम्भव हो गया, अनेक लोगों द्वारा अथक परिश्रम और प्रयास करने पर भी जब मूर्ति नहीं उठी, तब उसी स्थान पर सुन्दर मन्दिर बनवाकर श्री युगलनाथ भगवान प्रतिष्ठित किये गए। प्रतिष्ठा वि.सं. १७५१, वैशाख पूर्णिमा के शुभ दिन ठाकुर दलपतसिंहजी द्वारा अत्यन्त ठाठबाट के साथ सम्पन्न हुई जिसमें हजारों लोग सम्मिलित हुए, उस समय सांडेराव मेवाड़ के आधीन था और उस समय महाराजा राजसिंहजी राज्य करते थे, वे श्री नीम्बेश्वर महादेव के प्रति भक्ति रखते थे, आजी भी यहाँ वैशाख पूर्णिमा के दिन प्रति वर्ष मेला लगता है, प्रतिदिन यात्रियों की भीड़ लगी रहती है। वर्तमान समय में श्री नीम्बेश्वर मन्दिर की देखरेख श्रीमान जगतसिंह राणावत करते हैं, जब से इन्होंने प्रबन्ध संभाला है तब से इस तीर्थ का विकास तेजी से एवं सुन्दर रूप से हो रहा है। यह संयोग ही है श्री नीम्बेश्वर महादेव तीर्थधाम के नामकरण में असंख्य नीमवृक्ष, निम्बोराम रबारी, संत नीमनाथ और निम्बाशंकरजी ब्राह्मण की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। नीम्बेश्वर मन्दिर के दाहिनी ओर की बावड़ी युधिष्ठिर द्वारा बनवाई गई है, यहाँ पर श्री नवदुर्गाजी का चमत्कारी मंदिर भी शोभायमान है। युगलनाथ नीम्बेश्वर महादेव के अनेक चमत्कार प्रचलित हैं।

अंजनशलाका प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न

सांडेराव: दिनांक ५-२-२०१९ को महोत्सव शुभारंभ के साथ दिनांक १०-२-२०१९ को प्रभुजी की बांदोली, दिनांक ११-२-२०१९ को मंगल प्रतिष्ठा एवं भगवती दीक्षा के साथ गांव साझी, मेहंदी वितरण, विविध पूजन, द्वारोघाटन इत्यादी अनुष्ठान व कार्यक्रम विधिवत सम्पन्न हुए, आयोजन पर विविध आयोजनों के लाभार्थी परिवारों के साथ शाहीकरबा, फले चुंदडी व जय जिनेन्द्र जैसे मुख्य आयोजनों का लाभ मातुश्री हुलासीबाई मुलचंदजी बोराणा दोषी-मेहता (एम.टी.सी. ग्रुप, मधुबन टोयोटा, मुंबई) परिवार द्वारा लिया गया।

सांडेराव (पाली-राज.) गोडवाल की धर्मधरा पर श्री सांडेराव जैन संघ के तत्वावधान में श्री शांतिनाथ जिनप्रसाद के पावन प्रांगण में पंजाब केशरी पू.पू. आचार्य श्रीमद विजय वल्लभ सूरीश्वरजी म.सा. समुदाय के श्रुतभास्कर वर्तमान गच्छाधिपति प.पू. आचार्य श्रीमद विजय धर्मधुरंधरसूरीश्वरजी म.सा. आदि विशाल श्रमणश्रमणीवृदों की पावन निश्रा में श्री अभिनंदनस्वामीजी, श्री श्रेयांसनाथजी, श्री अरनाथजी, पंचधातुप्रतिमाजी व श्री शांतिनाथजी भगवान की प्रतिमाओं के साथ श्री पद्मावतीदेवी, श्री सरस्वती, श्री लक्ष्मीदेवी इत्यादी अधिष्ठायक देवदेवीयों एवं चौबिस देवकुलियों की अंजनशलाका-प्रतिष्ठा महोत्सव का भव्याति-भव्य आयोजन दिनांक ५-२-२०१९ से दिनांक १२-२-२०१९ तक अष्ठान्हिका महोत्सव स्वरूप हजारों जिनशासन प्रेमियों की पावन उपस्थिति में बड़े उत्साह व हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ।

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