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बीकानेर राज्य
बीकानेर राज्य की तत्कालीन डूँगरगढ़ तहसील के संबंध में भी राय बहादुर हुक्म सिंह सोढ़ी ने कतिपय मूल्यवान तथ्यात्मक जानकारियां अपनी कृति में समाहित की है। सोढ़ी लिखते हैं कि डूँगरगढ़ तहसील में कुल ७९ गांव हैं जिनमें से तीन गांव खालसा श्रेणी के हैं जबकि शेष सभी गांव पट्टेदारों के जागीरी गांव है। उन्होंने लिखा है कि डूँगरगढ़ तहसील की कुल जनसंख्या ४४००७ है, जिसमें २२०६३ पुरुष तथा २१४०४ महिलाएं है, वे यह भी लिखते हैं कि इस आबादी में ४१०५३ हिंदू तथा ११२१ मुस्लिम हैं जबकि १८३३ लोग अन्य जातियों से हैं, यहां पर स्थित डाकखानों तथा पोलिस स्टेशन्स के विषय में जानकारी प्रदान करते हुए सोढ़ी यह लिखते हैं कि बीकानेर राज्य के ‘डूँगरगढ़’ तहसील में ब्रिटिश पोस्ट-ऑफिस, डूँगरगढ़ में स्थित है उदरासर, बपेऊ, डूँगरगढ़ तथा सेरूणा में पुलिस स्टेशन स्थित है। सोढ़ी ने इस तहसील का महत्वपूर्ण स्थान ‘डूँगरगढ़’ को ही बताया है और यह लिखा है कि डूँगरगढ़ गाँव की स्थापना महाराजा डूंगरसिंह के नाम पर वि.सं. १९३७ अर्थात् ई. सन् १८८० में हुई थी, उस समय यहां पर एक हिंदी स्कूल, पुलिस स्टेशन तथा ब्रिटिश पोस्ट ऑफिस स्थित था।
डूँगरगढ़ की स्थापना
मध्य युग में सत्ता का केंद्र रहे बीकानेर राज्य की, स्थापना १४८८ ई. में मारवाड़ के राव बिका ने की। यही कारण है कि भारत की सिंध से लगी पश्चिमी सीमा को राजनीतिक एवं सैन्य दृष्टि से मजबूती मिली। राव बिका जी का विवाह पूगल के राव शेखा की सुपुत्री से हुआ। राव बिका जी ने कई जनहित कार्य करवाये, अंत में १५०४ में मुत्यु के पश्चात राव नारायण सिंह ने शासन संभाला। राव जैतसी ने १५२६ से १५४२ तक एवं राव कल्याण मल ने १५४२ से १५७४ तक राजकार्य संभाला, इसके बाद मुगलों के राज में कल्याण मल के पुत्र राजा रायसिंह ने मुगलो की अधीनता स्वीकार कर ली। आगे की पीढ़ी में महाराजा लालसिंह की मुत्यु के बाद उनका बेटा महाराजा सरदार सिंह राजगद्दी पर बैठा, उनकी कोई संतान नहीं थी उनकी मुत्यु के बाद महाराजा डूँगरसिंह ने राजकार्य संभाला, १८८७ में उनकी मुत्यु के बाद उनके छोटे भाई गंगासिंह को अल्पायु में महाराजा नियुक्त किया। महाराजा गंगासिंह के कार्यकाल में बीकानेर के विकास की गंगा बही थी।
राजा डूँगरसिंह
सोढ़ी हुक्मसिंह की कृति में महाराजा डूँगरसिंह के शासनकाल से संबंधित तथ्यों को अति संक्षेप में और सांकेतिक रूप से ही प्रस्तुत नहीं किया गया है वरन उनके व्यक्तित्व पर भी कोई टिप्पणी नहीं की गई है, जो कि एक महत्वपूर्ण आयाम था और जिसकी उपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए थी, इस दृष्टि से निष्पक्ष आकलन करने पर यह कहा जा सकता है कि महाराजा डूँगरसिंह एक दृढ़ चित्त, साहसी, न्याय प्रिय, विचारशील, ईश्वर भक्त और निराभिमानी नरेश थे, वे एक उदार, अच्छे-बुरे की पहचान रखने वाले, गुणग्राहक व्यक्ति थे जो विद्वानों का आदर कर उन्हें संतुष्ट सम्मानित करते थे। वे एक न्याय प्रिय शासक थे, इसीलिए उनके समय में दीवानी, फौजदारी, माल आदि के ऐसे कानून जारी किए गए जिनसे प्रजा को बड़ी सुविधा हो गई तथा राज्याधिकारियों अहलकारों की मनमानी पर अंकुश लगा, उन्हें राज्य कार्य व्यवस्था तथा प्रशासनिक सुधारों पर विशेष ध्यान दिया। उनकी गद्दीनशीनी के समय बीकानेर राज्य की कुल आय छह लाख रुपए वार्षिक थी, जो बड़ी कठिनाइयां होने पर भी, उनके समय में बढ़कर तिगुनी हो गई।
प्रजा में माल का हासिल नकद रुपयों में लेने की व्यवस्था, सरकारी मुलाजिमों द्वारा खुराक वसूली बंद किया जाना, पुलिस गिराई महकमों का पुनर्गठन, सरदारों ठाकुरों की रेख-रकम के विवाद के निष्पादन, सरकारी मुलाजिमों की आमदनी के अनुचित साधनों पर प्रतिबंध, स्कूलों तथा डिस्पेंसरियों का निर्माण, राज्य के वार्षिक आय-व्यय बजट का निर्माण शुरू होना आदि अनेक कार्य इन्हीं के शासनकाल में शुरू हुए थे, उनके समय में ही बीकानेर में ब्रिटिश डाकखाना शुरू हुआ।
कुएं और सरायें बनाई गईं, कई मंदिरों का निर्माण कराया गया, बीकानेर गढ़ में कतिपय महत्वपूर्ण निर्माण कराए गए। महाराजा ने अपने पूर्व-वती शासकों के समय से चले रहे राज्य ऋणों का चुकारा किया और राज्य को ऋण मुक्त बनाया, अपनी मृत्यु के समय उन्होंने राजकोष में पर्याप्त धन छोड़ा था, तभी तो परवर्ती नरेश को रेलवे निर्माण जैसे बड़े कार्यों को पूर्ण कर पाने में सहुलियत रही।

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