‘रिंणी’ तारानगर की प्राचीनता

‘रिंणी’ तारानगर की प्राचीनता

‘रिंणी’ तारानगर की प्राचीनता

१६ मार्च १९४१ ई. को यहाँ के जनहितैषी शासक तारासिंह जी के नाम पर चुरु जिले का कस्बा ‘तारानगर’ बना था, इससे पहले इस परिक्षेत्र का नाम ‘रिंणी’ था। ‘‘रिंणी’’ का नाम आते ही उत्सुकता रहती है कि ‘रिंणी’ नाम कब व क्यों पड़ा था यथा अलवर में रीणी भी है। ‘रिणी’ जियोलोजीकल शब्द है, जिसका अर्थ है कि जल शुष्क होने से बने रेतीले मैदान को ‘रिन’ ‘रिंणी’ ‘रैनी’ ‘रैणी’ (बोली के कारण) कहेंगे, ईसा से लगभग २००० वर्ष पूर्व (जब भी नदियां शुष्क हुई) यानी आज से लगभग ४००० वर्ष पूर्व में, रिंणी का मैदान अस्तित्व में आया था, जिसका संभावित क्षेत्र, रिणी केन्द्र से उत्तर में नोहर, भादरा, सिरसा तथा भटनेर (हनुमानगढ़) से सटकर पल्लू, पश्चिम में सरदार शहर के पूर्व तक तथा दक्षिण में चुरू एवं पूर्व में ददरेवा, सिंधमुख तक का भूभाग कमोबेश रूप में जीयोलोजीकल दृष्टि से प्राचीन समय में ‘रिंणी’ होना चाहिये था, इसकी सीमा ज्ञान हेतु सन् १८८४-८५ में रैनी निजामत बनायी गयी थी, जिसमें पल्लू, नोहर, भादरा सन् १९३१ तक थे, १९३१ की जनगणानुसार ‘रेनी’ निजामत का क्षेत्रफल ४,६४७ वर्गमील था, गांवों कस्बों की संख्या ६२७+५ थी, घरों की संख्या ४६,०८३ तथा जनसंख्या २,४६,०८३ थी। आज का ‘तारानगर’ विधानसभा क्षेत्र भी पूर्वकालीन जीयोलोजीकल ‘रिंणी’ का प्रकारान्तर से दिग्दर्शन कराता है, संक्षेप में ‘रिंणी’ का आशय है जल के सूखने पर रेणु उभरा हुआ-भूभाग यानी मैदान।

इतिहासकार डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने पाणिनी की अष्टाधायी को आधार मानकर पुस्तक ‘पाणिनीकालीन भारत’ में ‘रौणी’ स्थान को ‘रिणी’ होने की संभावना व्यक्त की है (चू.मं.शो.इ.पृ.२६ पर वर्णित नागरी प्रचारिणी पत्रिका वर्ष ५७ अंक २-३ पृ. २१९) जाट इतिहास में ‘ाकुर देशराज ने पाणिनी का समय ईसा पूर्व माना है तथा कुछ विद्वानों ने ई.पू. ५०० से ९०० वर्ष मानते है। कलियुग से पूर्व- ‘रिंणी’ परिक्षेत्र रामायण काल में मरूकांतर का हिस्सा था। महाभारतकाल में मरूप्रदेश जांगल प्रदेश का भाग था यानी वनसंपदा युक्त था, महाभारत के प्रसंगों से ‘रिंणी’ परिक्षेत्र के आस-पास के समाज तथा शाषन का बोध इन शब्दों में समझ सकते हैं- समाज तथा शासन में

अराजकता आ चुकी थी, विदुर जैसे नीतिवानों की अवहेलना हो रही थी। पापपूर्ण अन्न भक्षण से भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य जैसे वीर तथा बुद्धिमान भी सत्य का साथ न दे सके थे। मातृशक्ति की दुर्दशा थी, तभी तो पाँच पाण्डव प्रिया द्रोपदी को जुए में लगा दिया था। दुर्योधन चीर (शील) हरण को मदान्ध था, कला पुरूष श्री कृष्ण भगवान युद्ध टालना चाहते थे, फिर भी लड़ना पड़ा था। सच भी है ‘‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’’ महासमर में महाविनाश हुआ था, तब पुनर्रचना का प्रयास जरूरी था, यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ‘‘जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी निश्चित है’’ सो दैव पुरूष श्री कृष्ण भगवान को देवलोक गमन हुआ था, उनके देवलोक गमन से ही कलियुग की गणना भी मानते हैं। महाभारत कालीन अवशेष बांय की भी एक बावड़ी तथा श्याम पांडिया (कालाश) चुरू उत्सव २००७ धोरों की अनुगूंज जिला प्रशासन चूरू द्वारा प्रकाशित में वर्णित है कि सांब यज्ञाचार्य थे जिन्होंने सांडवो का इन्द्रप्रस्थ

(दिल्ली) में राजसूर्य यज्ञ करवाया था। सांब±पांडव बाद में बोलचाल में श्यामपांडिया हो गया। पांडवों ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया था, ऐसी लोकमान्यता है तथा आस-पास के अवशेष भी पुष्टि करते हैं। ऐतिहासिक तथ्यानुसार ‘रिंणी’ परिक्षेत्र के उत्तर में रंगमहल, बड़ोप्पल, सुलतान की थेड़ी गंगानगर तथा दक्षिण में बैरा’नगर (जयपुर) थे, जो विशाल बौद्ध केन्द्र थे, जिन्हें आगे चलकर हूणों ने बड़ी क्षति पहुँचायी थी। विक्रम संवत् का आरंभ तथा रिणी-ईसा पूर्व ५७वें वर्ष में विक्रम संवत्

आरंभ हुआ था, जो आज तक भी ‘तारानगर’ में स्वीकार्य है, निश्चित मत बताता है कि विक्रमादित्य का यहां के जनजीवन पर प्रभाव था और अवश्य ही विक्रम शासन से ‘रिंणी’ का प्रत्यक्षाप्रतक्ष सम्बंध भी था, तभी तो संवत् का क्रियान्वयन संभव था, जैन तथा बौद्ध क्रांति से परिदृश्य में बदलाव आना था ही। ई.पू. छ’ी सदी में वर्ण व्यवस्थानुसार ब्राह्मणों (सूत्रधारों) तथा (क्षत्रियों (शासकों) में वैचारिक मनमुटाव बढ़ गया था, परिणामत: क्षत्रिय कुलोत्पन्न इतिहास-‘ा-देशराज पृ-४० अनुसार) ‘‘ईसा पूर्व सवा पांच सौ वर्ष से ईसवी सन् ६५० तक था।’’ इन प्रसंगों के कलियुग से लेकर ईस्वी सन् आरम्भ तक ‘रिंणी’ परिक्षेत्र की समीक्षा कर सकते हैं। ईसवी सन् १०० में कनिष्क महाराजा ने विशाल बौद्ध केन्द्र थे, ४०५ ई. 

में चीनी यात्री फाहियान भारत आये थे, उनका यात्रा वृतान्त है ‘‘प्रजा सुखी एवं धन संपन्न थी, धर्मशालाओं तथा औषधालयों का उत्तम प्रबंध था।’’ (चू.मं.शो.इ.पृ.३०) यह वर्णन ‘रिंणी’ यानी तारानगर की धर्मशालाओं तथा औषधालयों का तथा औषधालय संचालन की प्रकृति से मेल खाता है। ईस्वी सन् ५१० के आसपास हूण जाति अपने नेता तोरमाण के नेतृत्व में भारत में दुबारा आक्रमक बनकर आये थे (पहले ई. सन् ४२० के लगभग आये थे तब तो गुप्तों ने भगा दिया था) पंजाब और राजस्थान से होते हुये मालवा तक पहुंच गये थे, इन्होंने ‘रिंणी’ के उत्तर के रंगमहल आदि तथा दक्षिण के बैराटनगर स्थित बौद्ध केन्द्रों का विध्वंस किया था, इस विध्वंस का दंश ‘रिंणी’ पर भी पड़ना था। ईस्वी सन् की सातवीं सदी में ‘रिंणी’ क्षेत्र में गुर्जरवंश का भी शासन माना जाता था, बैस वंशी सम्राट हर्षवर्धन (ई.६०६-४७ई) का भी ‘रिंणी’ क्षेत्र पर शासन था, इसी सदी में उत्तरी भारत में रघुवंशी प्रतिहारों का ही प्रबल राज्य था, प्रतिहारों में मिहिर भोज (ई.स.८४३ से ८८१ ई.) प्रसिद्ध पुरुष थे, भोज के बाद महेन्द्रपाल, महिपाल विनायक, देवपाल विजयपाल, राज्यपाल आदि प्रतिहार शासक हुये थे। चौहानों की शासन भूमि ‘रिंणी’- (चू.मं.शो.इ.पृ. ३६) के अनुसार चौहान पूर्व में वत्स गोत्रीविप्र, इन चौहानों में ‘रिंणी’ तथा इसके आस-पास वीर पुरूष सपादलक्षीय शाखा के चौहानों में चाहूवान (सांभर) ‘रिणी’ तथा इनके वंशज घंघरान (घांघु-चुरू) और इनके वंशोत्पन्न लोक देवता तथा सूरमा गोगाजी चौहान (ददरेवा) में हुये थे। ददरेवा के चौहानों में एक चाहिल भी थे, चाहिलों

फरवरी २०२०

ने एक समय ‘रिंणी’ पर भी कब्जा कर लिया था, चौहान कुलोत्पन्न घंघरान के पुत्र हर्ष तथा उनकी पुत्री ‘जीण’ तो आज भी वंदनीय है। ‘रिंणी’ ऐतिहासिक साक्ष्यों अनुसार नगर-शहर के रूप में विकसित हो चुका था तभी तो वि. स. ९९९ में जैन मूर्ति ‘रिंणी’ में स्थापित हो पायी थी। कोयला पत्तन (फोगां त. सरदारशहर) जहां अनन्तराव सांखला शासक थे, वह ‘रिणी’ परिक्षेत्र का ही भाग था, पल्लव. (पल्लू तह.नोहर) भाड़ण, ददरेवा आदि मुख्य मार्गों पर होने के कारण बड़े स्थानों के रूप में थे तथा जैन धर्म के प्रमुख केन्द्रों में गिने जाते थे, जो ‘रिंणी’ भूभाग के लिए गौरव था। (चू.मं.शी.इ.पू.४१४) तथा नोहर इतिहास एवं गाइड के पृ.६ के अनुसार जैन विद्वान् पुष्पदंत ने १० वीं सदी में यहाँ भ्रमण किया था।

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