Category: श्री बाबा गंगाराम की परम आराधिका

महाराजा अग्रसेन का युगीन संदेश

महाराजा अग्रसेन का युगीन संदेश

महापुरूष अपने जीवन में कुछ ऐसे आदर्शों की स्थापना करते हैं जो चिर युगीन हो जाते हैं, आने वाले युगों में राष्ट्र या समाज उनका अनुकरण कर अपने जीवन को मुदमंगलमय बनाता है, वे महापुरूष मात्र वाणी से आदर्शों की व्याख्या नहीं करते अपितु उन्हें अपने जीवन में कर्म से भी उतारते हैं। ऐसे महापुरूषों को हम मर्यादा पुरूषोत्तम राम, योगेश्वर कृष्ण, बुद्ध, महावीर स्वामी, चाणक्य, महात्मा गाँधी आदि के नाम से जानते हैं। ऐसे ही युगपुरूषों में महाराजा अग्रसेन का नाम अत्यन्त श्रद्धा से लिया जाता है। महाराज अग्रसेन का उद्भव द्वापर एवं कलियुग के संधिकाल में हुआ था। महाभारत...

भगवान परशुराम

भगवान परशुराम

एक बार कुछ किसान महाराजा अग्रसेन के पास पहुँचे, उन्होंने जंगली पशुओं द्वारा उपज को हानि से बचाने का महाराजा अग्रसेन से अनुरोध किया। महाराजा अग्रसेन ने कहा कि वह इस समस्या का निराकरण करेंगे, वह अपने कुछ सैनिकों के साथ जंगल में गए और वहां पर कृषि उपज को हानि पहुँचाना वाले मृगों व अन्य पशुओं को मार गिराया। जंगल से लौटते समय उनका सामना भगवान परशुराम से हुआ। परशुराम. जंगल से लौटते समय उनका सामना भगवान परशुराम से हुआ। परशुराम महाराजा अग्रसेन को आशीर्वाद देने के पश्चात जंगल में आने का कारण पूछा। अग्रसेन ने उन्हें कृषकों की समस्याओं...

महाराजा अग्रसेन

महाराजा अग्रसेन

अग्रसेन ने जब युवा अवस्था में प्रवेश किया तब नागलोक के राजा कुमुद के यहां से राजकुमारी माधवी के स्वयंवर का समाचार आया महाराजा ने अपने दोनों पुत्रों अग्रसेन और शूरसेन को इस स्वयंवर में भाग लेने के लिए भेजा, इस स्वयंवर में भू-लोक के ही नहीं अपितु देवलोक से भी अनेक राजकुमार भाग लेने आए थे, इन्द्र भी उनमें से एक थे। राजकुमारी माधवी ने जब स्वयंवर भवन में प्रवेश किया तो उसकी रूप-राशी को देखकर इन्द्र स्तब्ध रह में जहाँ राजस्थान व हरियाणा राज्य है इन राज्यों के बीच सरस्वती नदी बहती थी, इसी सरस्वती नदी के किनारे प्रतापनगर...

दधीचि तीर्थ

दधीचि तीर्थ

ऋषिश्रेष्ठ त्यागमूर्ति महर्षि दधीचि की तपोभूमि देहदान स्थल एवम् महामुनि पिप्लाद की जन्मभूमि ‘‘मिश्रीत’’ के सर्वांगीण विकास हेतु सनातन धर्म संसद नैमिषारण्य की पावन भूमि पर अष्टोत्तर शत श्रीमद् भागवत कथा ज्ञानयज्ञ महोत्सव का आयोजन मिश्रीत श्रीमद् भागवत कथा आयोजन समिति द्वारा १२ सितम्बर से १८ सितम्बर २०१८ हनुमानगढ़ी नैमिषारण्य (उत्तर प्रदेश) में सानन्द सम्पन्न हुआ। राष्ट्रसंत परमपूज्य विद्यावाचस्पति आचार्य स्वामी श्री गोविन्द देव गिरीजी महाराज ने अपनी मधुर वाणी में ज्ञान, भक्ति एवम् वैराग्य स्वरूप त्रिवेणी में श्रीमद् भागवत कथा का रसपान हजारों श्रद्धालु भक्तों को करवाया। भारत के विभिन्न प्रान्तों से पधारे श्रद्धालु भक्तजनों ने भगवान की पावन कथा...

श्री बाबा गंगाराम की परम आराधिका

श्री बाबा गंगाराम की परम आराधिका

श्री बाबा गंगाराम की परम आराधिका बाबा गंगाराम की अनन्य साधिका एवं भक्त शिरोमणि श्री देवकीनंदन की सहधर्मिणी और श्री पंचदेव मंदिर झुंझुनू की संस्थापिका माता गायत्री देवी अपने लाखों-लाखों भक्तों से विदा लेते हुए मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी दिनांक 29 नवम्बर 2017 को अपने नश्वर शरीर को त्यागकर बाबा के धाम के लिए महाप्रयाण कर गयी. मंदिर में एक ओर जहाँ भक्तवृंद घंटे,नगाड़े और शंख की ध्वनि के साथ बाबा की आरती में मग्न थे,वहीं माँ गायत्री बाबा गंगाराम का नाम उच्चारित करते हुए इस मृत्युलोक को छोड़कर परम ज्योति में लीन हो गयी. लाखों भक्तों की जीवन प्रेरणा आध्यात्म शक्ति...

श्राद्ध कर्म से मिलती पूर्वजों को मुक्ति

श्राद्ध कर्म से मिलती पूर्वजों को मुक्ति

पितृ पक्ष का महत्व : पौराणिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है कि देवपूजा से पहले जातक को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिये। पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजूर्गों का सम्मान और मृत्योपरांत श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। इसके पीछे यह मान्यता भी है कि यदि विधिनुसार पितरों का तर्पण न किया जाये तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है। पितृ पक्ष को मनाने का ज्योतिषीय कारण भी है। ज्योतिषशा में पितृ दोष काफी

उद्धारक है गणेश संकष्ट चतुर्थी

उद्धारक है गणेश संकष्ट चतुर्थी

ऋषियों ने स्कन्द (स्वामी कार्तिकेय) से पूछा- ‘हे देव! दरिद्रता और दु:खों से आतुर, दुश्मनों से दु:खी, धनहीन, पुत्रहीन, बेघर, विद्या से रहित दु:खी व्यक्ति अपने सुख के लिए, उपद्रवों से बचने के लिए,अपने कल्याण के लिए कौन से व्रत का अनुष्ठान करें जो उनके लिए सिद्धिदायक हो, कृपा करके हमें यह बताइये!’यह सुनकर स्वामिकार्तिकेय बोले, ‘हे मुनियों! संकट हरने वाला, सम्पत्ति और सुख देने वाला, एक उत्तम व्रत मैं आपको बताता हूँ जिसके करने से मनुष्य संकटों से पार होकर सुखी बनता है

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव सम्पूर्ण मण्डल में, घर-घर में, मन्दिर-मन्दिर में मनाया जाता है, अधिकतर लोग व्रत रखते हैं और रात को बारह बजे ही ‘पंचामृत या फलाहार’ ग्रहण करते हैं, फल, मिष्ठान,वस्त्र, बर्तन, खिलौने और  रुपये लुटाए जाते हैं, जिन्हें प्राय: सभी श्रद्धालु लूटकर धन्य होते हैं। गोकुल, नन्दगाँव, वृन्दावन आदि में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बड़ी धूम मचती है। छबीले का छप्पन भोग श्रीकृष्ण आजीवन सुख तथा मानव सेवा में रहे, इसलिए जन्माष्टमी को इतने शानदार ढंग से मनाया जाता है,इस दिन अनेक प्रकार के मिष्ठान्न, पकवान बनाए जाते हैं। जैसे लड्डू, चकली

भृगुवंशी अथर्वानन्दन महर्षि दधीचि

भृगुवंशी अथर्वानन्दन महर्षि दधीचि

भारत भूमि के लिए किसी ने सत्य ही कहा है ‘‘आतो सगला ने शरमावे, इन पर देव रमण न आवे, इनरो यश नर-नारी गावे, आ धरती आपा सगलां री.ऐसी पावन भूमि पर महात्यागी, महाज्ञानी, परोपकारी, धर्मनिष्ठ, तपोमुर्ति प्रात: स्मरणीय महर्षि दधीचि ने सतयुग में जन्म लिया। द्वापर युग की बात है – राजा जनमेजय भगवान वेद व्यासजी से पूछते हैं- महर्षि दधीचि कौन थे, वे किसके पुत्र थे, इनकी माता कौन थी और भगवती दधिमथी उनकी रक्षा करने वाली कौन थी? व्यासजी बोले – हे राजन! तुमने बड़ा ही सुन्दर प्रश्न पूछा? जो बड़ा ही रोचक है। ध्यान पूर्वक तुम श्रवण...

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